गणेश चतुर्थी का पावन पर्व आपके जीवन में सुख समृद्धि और अपार खुशियाँ लेकर आए
गणेश चतुर्थी का महान पर्व भारतीय संस्कृति और आस्था का एक अद्भुत प्रतीक है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विघ्नहर्ता, बुद्धि और समृद्धि के दाता भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में अत्यधिक उत्साह और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। इस दौरान श्रद्धालु अपने घरों और सार्वजनिक पंडालों में ‘गणपति बप्पा’ की आकर्षक मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित करते हैं और अगले 10 दिनों तक पूरे विधि-विधान, मंत्रोच्चार तथा आरती के साथ उनका पूजन करते हैं। गणेश चतुर्थी का पावन पर्व भारतीय जनमानस की आस्था, भक्ति और उल्लास का अनुपम संगम है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर को पड़ रही है, जिस दिन विघ्नहर्ता, बुद्धि और रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव का यह महान उत्सव पूरे देश में अत्यंत श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश का प्राकट्य दोपहर के समय (मध्याह्न काल) हुआ था, इसलिए 14 सितंबर को शुभ मुहूर्त में ही गणपति बाप्पा की प्रतिमा की स्थापना और षोडशोपचार पूजन करना सर्वोत्तम माना गया है। भक्तजन महीनों पहले से इस दिन की तैयारी करते हैं और अपने घरों व भव्य सार्वजनिक पंडालों में मिट्टी से निर्मित ईको-फ्रेंडली गणपति प्रतिमाओं का स्वागत ढोल-नगाड़ों और ‘गणपति बप्पा मोरया’ के गूंजते जयकारों के साथ करते हैं।
गणेश चतुर्थी, जिसे विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख, पवित्र और उल्लासपूर्ण त्योहारों में से एक है, जो बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होने वाला यह 10 दिवसीय महाउत्सव पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है, जिसके अनुसार इसी दिन माता पार्वती द्वारा रचित बालक को भगवान शिव ने गज (हाथी) का मस्तक प्रदान कर ‘गणपति’ नाम दिया था और यह वरदान दिया था कि किसी भी शुभ कार्य या पूजा की शुरुआत सबसे पहले गणेश जी की आराधना से ही होगी। गणेश जी को ‘विघ्नहर्ता’ माना जाता है, इसलिए लोग अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने, नए कार्यों के सफल शुभारंभ और बुद्धि-समृद्धि की प्राप्ति के लिए इस दौरान अपने घरों और सार्वजनिक पंडालों में मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित करके पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ इसका एक महान ऐतिहासिक और सामाजिक पहलू भी है; सन 1893 में स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया था ताकि ब्रिटिश शासन के खिलाफ देशवासियों को एक मंच पर लाकर एकजुट किया जा सके। 10 दिनों तक चलने वाले इस भक्तिमय माहौल में बप्पा को मोदक और दूर्वा अर्पित की जाती है, और अंत में अनंत चतुर्दशी के दिन ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के जयकारों के साथ प्रतिमा का जल में विसर्जन कर दिया जाता है, जो हमें यह गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है कि सृष्टि की हर रचना अंततः प्रकृति में ही विलीन हो जाती है।
पूजा मुहूर्त:
इस वर्ष में गणेश चतुर्थी उत्सव 14 सितंबर 2026 से शुरू होकर 25 सितंबर 2026 तक मनाया जाएगा। वर्ष 2026 में 10 दिवसीय गणेशोत्सव 14 सितंबर 2026 (सोमवार) से शुरू होकर 25 सितंबर 2026 (शुक्रवार – अनंत चतुर्दशी) तक चलेगा।
गणेश स्थापना और 10 दिनों के मुख्य पूजन मुहूर्त
- गणपति स्थापना मुहूर्त (14 सितंबर 2026):सुबह 11:02 बजे से दोपहर 01:31 बजे तक (मध्याह्न काल)।
- दैनिक पूजा मुहूर्त (14 सितंबर से 25 सितंबर):
- प्रातःकाल पूजा: सुबह 06:00 बजे से 08:30 बजे तक।
- संध्या आरती: शाम 06:30 बजे से 08:00 बजे तक।
गणेश विसर्जन कब कर सकते हैं?
गणपति विसर्जन आप अपनी पारिवारिक परंपरा और मान-मानौवल के अनुसार निम्नलिखित दिनों में कर सकते हैं:
- डेढ़ (1.5) दिन का विसर्जन:15 सितंबर 2026 (मंगलवार)
- 3रे दिन का विसर्जन:16 सितंबर 2026 (बुधवार)
- 5वें दिन का विसर्जन:18 सितंबर 2026 (शुक्रवार)
- 7वें दिन का विसर्जन:20 सितंबर 2026 (रविवार)
- 10वें दिन का विसर्जन (अनंत चतुर्दशी):25 सितंबर 2026 (शुक्रवार)
गणेश विसर्जन की सही और सरल विधि
- उत्तर पूजा:विसर्जन से ठीक पहले बप्पा की अंतिम आरती करें और उन्हें धूप, दीप, दूर्वा, और मोदक/लड्डू का भोग लगाएं।
- क्षमा याचना:हाथ जोड़कर पूजा के दौरान हुई किसी भी भूल-चूक के लिए भगवान गणेश से क्षमा मांगें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
- प्रतिमा को हिलाना:विसर्जन से पूर्व ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ का जयकारा लगाते हुए प्रतिमा को उसके स्थान से थोड़ा सा आगे खिसकाएं (यह इस बात का प्रतीक है कि पूजा संपन्न हुई और अब विसर्जन की अनुमति है)।
- विसर्जन की प्रक्रिया:
- प्रतिमा को आदरपूर्वक उठाकर किसी पवित्र नदी, तालाब, या स्वच्छ जलकुंड पर ले जाएं।
- यदि घर पर विसर्जन कर रहे हैं, तो एक बड़े साफ बाल्टी या ड्रम में शुद्ध जल भरें और उसमें धीरे-धीरे मिट्टी की प्रतिमा को विसर्जित करें।
- जब प्रतिमा पूरी तरह पानी में घुल जाए, तो उस पवित्र जल और मिट्टी को घर के गमलों या पौधों में डाल दें।
पूजा विधि:
गणेश चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणेश की स्थापना और पूजन शास्त्रोक्त विधि (षोडशोपचार विधि) से की जाती है। घर में गणपति बप्पा की कृपा और सुख-समृद्धि लाने के लिए चरणबद्ध पूजा विधि:
पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
- प्रतिमा व स्थान: मिट्टी की गणेश प्रतिमा, चौकी, लाल या पीला कपड़ा, कलश, नारियल, आम के पत्ते।
- पूजन सामग्री: दूर्वा (21 घास), मोदक/लड्डू, लाल पुष्प (गुड़हल/गेंदा), रोली, अक्षत (बिना टूटे चावल), चंदन, हल्दी, धूप, दीपक, कपूर, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)।
चरणबद्ध गणेश पूजन विधि
1. स्थान शुद्धि व संकल्प
- स्नान करके स्वच्छ (पीले या लाल) वस्त्र धारण करें।
- उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठें।
- हाथ में थोड़ा जल लेकर आचमन करें और अपने ऊपर जल छिड़ककर स्वयं को शुद्ध करें।
2. चौकी स्थापना व कलश स्थापना
- एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
- उस पर थोड़े अक्षत (चावल) रखकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
- चौकी के पास एक तांबे या पीतल के कलश में जल भरें, उस पर आम के पत्ते रखें और नारियल (लाल कपड़े में लपेटकर) स्थापित करें।
3. प्राण प्रतिष्ठा व आह्वान
- हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर भगवान गणेश का ध्यान करें और मंत्र बोलें:
“ॐ गं गणपतये नमः” - अक्षत और पुष्प बप्पा के चरणों में अर्पित करके प्रार्थना करें कि वे आपके घर में पधारें और विराजमान हों।
4. स्नान व वस्त्र समर्पण
- प्रतिमा को सांकेतिक रूप से दुर्वा या आचमनी से जल की बूंदें छिड़ककर स्नान कराएं।
- इसके बाद पंचामृत और पुनः शुद्ध जल से स्नान का भाव करें।
- भगवान गणेश को कलावा (मौली) के रूप में वस्त्र और जनेऊ अर्पित करें।
5. तिलक, पुष्प और दूर्वा अर्पण
- गणेश जी के मस्तक पर चंदन, रोली और हल्दी का तिलक लगाएं और अक्षत लगाएं।
- उन्हें लाल फूल, गेंदे की माला और शमी के पत्ते अर्पित करें।
- दूर्वा अर्पण: भगवान गणेश को 21 दूर्वा की गांठें “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र जपते हुए अर्पित करें (यह गणेश जी को अत्यंत प्रिय है)।
6. भोग व धूप-दीप
- धूप और शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
- बप्पा को उनका सबसे प्रिय भोग 21 मोदक या मोतीचूर के लड्डू अर्पित करें। साथ में ऋतु फल (केला) और पान-सुपारी भी चढ़ाएं।
7. आरती व मंत्र जप
- कपूर या घी के दीपक से ‘जय गणेश, जय गणेश देवा’ की आरती गाएं।
- आरती के बाद 108 बार गणेश गायत्री मंत्र या मूल मंत्र का जप करें:
“ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥”
8. क्षमा प्रार्थना
- पूजा के अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना करें:
“हे विघ्नहर्ता, अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए हमें क्षमा करें। हमारे घर में रिद्धि-सिद्धि और शांति का वास बनाए रखें।”
10 दिनों तक नियमित पूजा का नियम
स्थापना के बाद रोजाना सुबह और शाम को दीपक जलाकर आरती करें, दूर्वा व ताजा भोग अर्पित करें। ध्यान रखें कि जितने दिन बप्पा घर में रहें, घर का वातावरण सात्विक और भक्तिमय बना रहे।
गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा:
गणेश चतुर्थी से जुड़ी भगवान श्री गणेश के प्राकट्य (जन्म) की पौराणिक कथा अत्यंत रोचक और आध्यात्मिक महत्व रखने वाली है। इसका वर्णन शिव पुराण और मत्स्य पुराण में विस्तार से मिलता है।
एक बार माता पार्वती कैलाश पर्वत पर स्नान करने की तैयारी कर रही थीं। उस समय नंदी और अन्य गिल्ल-गण पहरा दे रहे थे, लेकिन भगवान शिव के आने पर वे उन्हें रोक नहीं पाए और वे सीधे अंदर चले आए। इससे माता पार्वती को थोड़ी सहजता महसूस नहीं हुई और उन्होंने विचार किया कि उनका भी एक ऐसा द्वारपाल होना चाहिए जो केवल उनकी आज्ञा का पालन करे। माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन (मैल और उबटन के मिश्रण) से एक सुंदर बालक की आकृति बनाई और उसमें अपनी शक्तियों से प्राण फूंक दिए। बालक अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी था। माता पार्वती ने उसे अपना पुत्र माना और द्वार पर पहरा देने का आदेश देते हुए कहा, “हे पुत्र! जब तक मैं स्नान करके बाहर न आऊं, तब तक किसी भी पुरुष को अंदर मत आने देना।“ बालक अपनी माता की आज्ञा सिर आंखों पर रखकर द्वार पर हाथ में दंड लेकर खड़ा हो गया।
कुछ समय पश्चात भगवान शिव वहां पहुंचे और अंदर जाने लगे। बालक ने उन्हें रोकते हुए कहा, “ठहरिए! मेरी माता की आज्ञा के बिना आप अंदर नहीं जा सकते।” भगवान शिव ने उसे समझाने का प्रयास किया कि वे माता पार्वती के पति हैं और यह उनका ही निवास स्थान है, परंतु बालक अपनी माता की आज्ञा पर अडिग रहा और उसने शिव जी का मार्ग रोक दिया। भगवान शिव के गणों (नंदी, भृंगी आदि) और देवताओं ने भी बालक को समझाने की कोशिश की, लेकिन बालक ने उन सभी को परास्त कर दिया। बालक के इस अद्भुत पराक्रम को देखकर स्वयं भगवान शिव अचंभित हुए। अंततः, अपनी आज्ञा का उल्लंघन और बालक के हठ को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। भगवान शिव और बालक के बीच भीषण युद्ध हुआ और क्रोधाग्नि में आकर शिव जी ने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक धड़ से अलग कर दिया।
जब माता पार्वती स्नान के बाद बाहर आईं और अपने पुत्र को रक्तरंजित व मृत अवस्था में देखा, तो वे अपार शोक और क्रोध से भर गईं। उनका रौद्र रूप देखकर दसों दिशाएं कांपने लगीं। माता पार्वती ने प्रलय लाने का संकल्प ले लिया और कहा कि जब तक उनका पुत्र जीवित नहीं होगा, वे इस सृष्टि को नष्ट कर देंगी। समस्त देवगण और भगवान ब्रह्मा-विष्णु भयभीत होकर माता पार्वती के समक्ष उपस्थित हुए और उनसे शांत होने की प्रार्थना करने लगे। माता पार्वती ने शर्त रखी कि उनका पुत्र पुनः जीवित किया जाए और उसे देवताओं में सर्वोच्च स्थान मिले।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भगवान शिव ने ब्रह्मा जी को आदेश दिया कि उत्तर दिशा की ओर जाएं और जो भी प्राणी सबसे पहले अपनी संतान की तरफ पीठ करके सोया हुआ मिले, उसका सिर काटकर ले आएं। देवताओं को एक हथिनी (गज) का छोटा बच्चा मिला जो अपनी मां की तरफ पीठ करके सोया हुआ था। ब्रह्मा जी उस गज (हाथी) के शिशु का मस्तक ले आए। भगवान शिव ने उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखा और उसमें प्राणों का संचार कर दिया। बालक पुनः जीवित हो उठा।
बालक के इस नए रूप को देखकर सभी देव प्रसन्न हुए। भगवान शिव ने उस बालक को अपने सभी गणों का स्वामी घोषित किया और उसे ‘गणपति’ (गणों का अधिपति) नाम दिया। साथ ही, त्रिदेवों और सभी देवताओं ने मिलकर बालक को आशीर्वाद दिया:
- प्रथम पूज्य का वरदान: भगवान शिव ने वरदान दिया कि संसार में किसी भी मांगलिक या शुभ कार्य, जैसे यज्ञ, विवाह या गृह प्रवेश, में सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा होगी। यदि कोई बिना गणेश पूजन के कोई काम शुरू करेगा, तो उसका कार्य सफल नहीं होगा।
- विघ्नहर्ता: उन्हें भक्तों के सभी कष्टों और बाधाओं को हरने वाला ‘विघ्नहर्ता’ घोषित किया गया।
जिस दिन भगवान गणेश को यह नया जीवन और प्रथम पूज्य का वरदान मिला, वह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि थी। इसी कारण हर वर्ष इस पावन तिथि को गणेश चतुर्थी के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।